समग्र नैतिक क्रान्ति द्रष्टा- सत्पथान्वेषक श्रीराम

 समग्र नैतिक क्रान्ति द्रष्टा-सत्पथान्वेषक श्रीराम  

विद्यार्थी का विद्याध्ययन कितना सफल हुआ? इसका अनुमान उसके अंदर सत्पथान्वेषण की जिज्ञासा को देखकर ही लगाया जा सकता है। जिस विद्यार्थी ने विद्याध्ययन करके सत्पथान्वेषण के महान गुण को जागृत कर लिया हो, वह फिर कभी भी गलत मार्ग पर नहीं चलेगा। जीवन भर वही दुर्भाग्यवान कुमार्गगामी होकर भटकते रहते हैं, जिन्होंने विद्याध्ययन काल में सौभाग्य का द्वार खोलने वाली कुंजी सत्पथान्वेषण का साक्षात्कार नहीं किया है। सत्पथान्वेषण से सफल जीवन के संचालन की दक्षताएं प्राप्त होती हैं। राष्ट्र की नैतिक जिम्मेदारी बनती है कि प्रत्येक व्यक्ति को विद्यार्जन के साथ सत्पथान्वेषण की सुविधा उपलब्ध कराए। जिसके लिए सत्पथान्वेषक श्रीराम का जीवन-चरित्र अनिवार्य रूप से पढ़ाया जाए, इससे प्रत्येक क्षेत्र में दक्षता प्राप्ति के साथ चरित्र निर्माण का भी ध्येय हो पूर्ण हो जाएगा। 
रामायण महाग्रन्थ में श्रीराम के चरित्र का उल्लेख-
भवान् सर्वत्र कुशल: सर्वभूतहिते रतः। 
अर्थात्- आप समस्त प्राणियों के हित में तत्पर तथा इहलोक और परलोक की सभी बातों के ज्ञान में निपुण हैं।  
हमारे राष्ट्रनायक श्रीराम ने गुरुकुल जाकर विद्याध्ययन, सत्पथान्वेषण किया अर्थात् श्रेष्ठ जीवन मूल्यों की आधारशिला का साक्षात्कार किया। 
गुरु गृह गए पढ़न रघुराई। 
अलप काल विद्या सब पाई।।  
सत्पथान्वेषण करने के पश्चात् ही श्रेष्ठ मानव बना जा सकता है। शाश्वत राष्ट्र का निर्माण सत्पथान्वेषण के बल पर ही संभव है। प्राचीन काल से ऋषियों द्वारा संचालित गुरुकुलों में सत्पथान्वेषण समग्रता का मानक था। 
वर्तमान शिक्षा व्यवस्था में नैतिक मूल्यों की समझ नहीं है, यही कारण है कि हम शिक्षित तो बहुत हुए, डिग्रीधारी, पदक विजेता बने लेकिन सभ्य, संवेदनशील और शूरवीर नहीं। अपराधी, बेईमान और राष्ट्रद्रोही भी शिक्षित होते हैं, इसलिए केवल शिक्षित होना सदाचार का प्रमाण नहीं है। सत्पथान्वेषण ही समग्र नैतिक क्रान्ति का सूत्रधार है, हम सभी शिक्षा के साथ सत्पथान्वेषक श्रीराम के महान चरित्र का महत्व समझें। 
प्रात काल उठि कै रघुनाथा।
मातु पिता गुरु नावहिं माथा।। 
श्रेष्ठ को सदैव नमस्कार हमारी परंपरा रही है, माता-पिता-गुरु की वंदना करना पुण्यों का अभिवर्धन कराने वाला है। लोक में उन सभी सतपुरुषों का अभिवंदन करना चाहिए, जिनसे सत्प्रवृत्तियों का संचालन होता हो।
 हमें किसे नमस्कार नहीं करना चाहिए? अनैतिक गतिविधियों में लिप्त दुष्टों को नमस्कार नहीं करना चाहिए। दुष्ट को सम्मान देने का तात्पर्य अप्रत्यक्ष रूप से हम उसकी दुष्टता-अनीति-अन्याय का समर्थन कर रहे हैं। जिन व्यक्तियों के अंदर संपत्ति, वैभव, पद तथा प्रभाव के चलते नतमस्तक होने की गलत आदत होती है, वे निश्चित तौर पर अवनति की ओर जाते हैं। 
सामान्य व्यक्तियों के बीच सामान्य अभिवादन करना सामान्य लोकोपचार की प्रक्रिया भर है लेकिन नतमस्तक होना अर्थात् उसके पदचिन्हों पर चलना, कलुषित, संकीर्ण, विकृत मानसिकता से युक्त विचारों का नारा बुलंद करना, जिनसे मानवीयता की गरिमा च्युत होती हो। नतमस्तक केवल और केवल दैवीयसंपदा के समक्ष ही होना चाहिए। 
यह लोक स्वयं में परमात्मा का स्वरूप है, जिसमें श्रेष्ठ परंपराएं स्वमेव ही श्रेष्ठ प्रवृतियों का संरक्षण एवं निकृष्ट प्रवृत्तियों के भक्षण की शक्ति रखती हैं। भारतीय समाज ने सदैव गलत विचार, कार्य एवं मानसिकता वाले समूह या सत्ता को दुत्कार दी है। यहां पापी उन्हें कहा जाता जो मानवीय गरिमा से गिरकर दुष्कृत्य करते हैं और पुण्यवान वे माने जाते जो सत्कर्मों के संवर्धन में संलग्नित होकर अपनी सीमित उपलब्धता में भी अपना आदर्श अचल रखते हैं। 
  गुरुकुल से विद्या प्राप्ति के पश्चात् श्रीराम अयोध्या में आ गए थे, तभी विश्वामित्र ऋषि का आगमन हुआ, जिन्होंने दुष्ट असुरों के विनाश एवं यज्ञ की रक्षा हेतु महाराज दशरथ से श्रीराम को अपने साथ ले जाने का अभिप्राय बताया। 
तुलसी बाबा के शब्दों में ऋषि विश्वामित्र जी द्वारा महाराज दशरथ से श्रीराम को वन में ले जाने का प्रकरण-
 असुर समूह सतावहिं मोही।
          मैं जाचन आयउं नृप तोही।।
अनुज सहित देहु रघुनाथा।
         निसिचर बध मैं होब सनाथा।।
 देहु  भूप मन  हरषित   तजहु  मोह  अज्ञान । 
धर्म सुजस प्रभु तुम्ह को इन्ह कहं अति कल्यान।।  
सत्पथान्वेषक श्रीराम के महान पराक्रम से जप, तप, ध्यान तथा यज्ञ में निमग्न ऋषियों की तपस्या पूर्ण हुई। ऋषि विश्वामित्र का यज्ञानुष्ठान पूर्ण होते ही सुयोग्य शिष्य श्रीराम को आशीर्वाद स्वरुप सम्पूर्ण दिव्य अस्त्रों का ज्ञान-विज्ञान प्रदान किया गया, जिससे भविष्य में समग्र  राक्षस जाति का उन्मूलन हुआ। 
वाल्मीकि रामायण का यह वाक्य सदैव स्मरणीय है- 
त्रीण्येव व्यसनान्यत्र कामजानि भवन्त्युत। 
मिथ्यावाक्यं तु परमं तस्माद् गुरुतरावुभौ।। 
परदाराभिगमनं विना वैरं च रौद्रता। 
मिथ्यावाक्यं न ते भूतं न भविष्यति राघव।। 
अर्थात्- इस जगत में काम से उत्पन्न होने वाले तीन ही व्यसन होते हैं। मिथ्याभाषण बहुत बड़ा व्यसन है, किन्तु उससे भी भारी दो व्यसन और हैं, परस्त्रीगमन और बिना वैर के ही दूसरों के प्रति क्रूरतापूर्ण बर्ताव। रघुनंदन ! इनमें से मिथ्याभाषण रूप व्यसन तो न आप में कभी हुआ है और न आगे होगा ही।
यह तीन अवगुण समूचे मानव समुदाय में अवांछनीयता का प्रसार करते हैं, मिथ्याभाषण का विस्तार लोभ विकार उत्पन्न करके अनैतिक धनार्जन का नशा चढ़ाता है। परस्त्रीगमन की अनियंत्रित कामवासना का विस्तार आत्मीय रिश्तों की बलि चढ़ाकर ही मानता है। अकारण क्रूरतापूर्ण व्यवहार का विस्तार क्रोध रूपी कीचड़ कलह-क्लेश के दागों से शान्तिरूपी उज्जवलता का मुंह काला करता रहता है। मूल विकार काम है, क्रोध एवं लोभ सहायक हैं। मिथ्या भाषण न करने वाला काम तथा लोभ का विकास व्यवहारिक रीति से धरातल पर कर नहीं पाएगा। व्यभिचार और भ्रष्टाचार झूठ बोले बिना संभव नहीं, इसलिए सत्य भाषण का व्रत पुण्य की श्रेणी में आता है क्योंकि सत्यभाषी सहज में कदाचार करने से बचा रहता है। मिथ्याभाषण से दोहरा चरित्र निर्मित होता है, मिथ्याभाषी स्वयं के स्वरूप से विचलित रहता है। वह जितना ज्यादा-ज्यादा मिथ्याभाषण करता वैसे-वैसे उसका आत्मबल क्षीण होता जाता है, इसलिए मिथ्याभाषी आंख चुराकर बात करता है। 
वाणी साक्षात आत्मा है, जिसने भी अपनी वाणी को प्रत्यक्ष कर लिया, धरा पर उसकी ख्याति प्रत्यंगिरा की हो जाती है। साधना वाणी के मौन अभ्यास को प्राथमिकता प्रदान करती है क्योंकि सत्य का साक्षात्कार असत्य संवाद के लोक से हमेशा के लिए अप्रत्यक्ष रहता है। संसार असत्य संवाद की टकसाल है और मोक्ष सत्य संवाद का साक्षात्कार है। आत्म-साक्षात्कार प्राप्त मनुष्य सिद्ध पुरुष माना जाता है। धरती पर शान्ति, प्रेम, सदाचार तथा संतोष सच्चे अर्थों में तभी होगा जब मिथ्याभाषण का बोलबाला शून्य घोषित हो जायेगा। विद्याकाल में सत्पथान्वेषण हमें असत्य भाषण न करने का अद्भुत ज्ञान प्रदान करता है, जिसकी नींव पर एक विराट राष्ट्र का निर्माण करने वाले धर्मराजों का निर्माण होता है। 
रामायण में सत्य की महिमा- 
सत्यमेकपदं ब्रह्म सत्ये धर्मः प्रतिष्ठितः।
सत्मेवाक्षया वेदाः सत्येनावाप्यते परम्।। 
अर्थात्- सत्य ही प्रणवरूप शब्द ब्रह्म है, सत्य में ही धर्म प्रतिष्ठित है, सत्य ही अविनाशी वेद है और सत्य से ही परब्रह्म की प्राप्ति होती है।  
इसलिए जीवनकाल में हम सत्यभाषण का संकल्प धारण कर महान चरित्र निर्माण का व्यक्तित्व खड़ा करें। सत्यभाषण से सत्यमेधा प्राप्त होती है, बुद्धि स्थिर एवं शुद्ध अवस्था में रहती है जबकि असत्यभाषण  विक्षिप्तता का विकार बुद्धि में लाने लगता है। बहुत से मनुष्य झूठ बोलने को सामान्य बात समझते हैं, इससे पूरी बुद्धि अशुद्ध एवं व्यक्तित्व में विसंगती उत्पन्न होती है, फिर व्यक्ति अपनी आत्मा की आवाज नहीं सुन पाता है। जिसने आत्म संवाद स्थापित नहीं किया, उसका जीवन दल-बदल में ही चिंतातुर रहता, अस्थिरता में डोलता रहता है। इनको किसी भी रिश्ते तथा विचार में विश्वास नहीं रहता है, फिर इनको निश्चित तौर पर मनोरोगी बनना तय है। हम कह सकते हैं, मिथ्याभाषण मनोरोग देता है जबकि सत्यभाषण मनोबल बड़ाने का कार्य करता है। सत्यसंवाद आत्म साक्षात्कार की ओर ले जाता है, सत्यसंवाद सत्पथ की ओर ले जाता है, सत्यसंवाद सभ्य मित्रों की ओर ले जाता है, सत्यसंवाद अपराध मुक्त जीविका की ओर ले जाता है, सत्यसंवाद पवित्रता की ओर ले जाता है, सत्यसंवाद मानव को देवत्व की ओर ले जाता है, सत्यसंवाद प्रकृति की ओर ले जाता है, सत्यसंवाद वास्तविकता से परिचय कराता है। सत्यसंवाद की शक्ति असाधारण है, यह मानव को धर्म के ध्रुव सत्यों से परिचित कराता रहता है। सत्यसंवाद की पृष्ठभूमि पर ही आत्म जागरण से लेकर राष्ट्र जागरण तक की यात्रा पूर्ण होती है। अत: हम सब अपने वास्तविक कल्याण की परिणिति हेतु गंभीरता से सत्यपथान्वेषक श्रीराम के महान चरित्र का अनुगमन करें और अनंत सद्गुणों का समावेश अपने व्यक्तित्व में करें।
✍️अमित निरंजन 
लेखक-समग्र नैतिक क्रान्ति द्रष्टा राष्ट्रादर्श श्रीराम उन्नायक - श्रीराम नवमी राष्ट्रीय चरित्र दिवस अभियान samagranaitikkranti@gmail.com 



 


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