समग्र नैतिक क्रान्ति द्रष्टा-सत्योपदेशक श्रीराम
समग्र नैतिक क्रान्ति द्रष्टा-सत्योपदेशक श्रीराम
प्रभु श्रीराम का वनवासकालीन चित्रण गोस्वामी तुलसीदास द्वारा-
मंगलरूप भयउ बन तब ते।
कीन्ह निवास रमापति जब ते।।
फटिक सिला अति सुभ्र सुहाई।
सुख आसीन तहां द्वौ भाई।।
कहत अनुज सन कथा अनेका।
भगति बिरति नृपनीति बिबेका।।
सत्योपदेशक श्रीराम ने वनवास में अनुज लक्ष्मण को भक्ति, वैराग्य, राजनीति और ज्ञान की अनेक कथाएं कहकर उपदेश प्रदान किया तथा वनवास उपरांत अयोध्या में भी सभी अनुजों को सत्य उपदेश प्रदान किया।
राम करहिं भ्रातन्ह पर प्रीती।
नाना भांति सिखावहिं नीती।।
सत्य उपदेश श्रवण से ही महान जीवन मूल्यों को अंगीकार करने की प्रेरणा मिलती है। जैसे मानव देह में नेत्र देखने का कार्य करते हैं, उसी प्रकार सत्य उपदेश विवेक रूपी नेत्र प्रदान करता है। जिसके आधार पर सत्य-असत्य का बोध होता है। सत्य प्रकाश, आनंद एवं शांति प्रदान करता है जबकि असत्य अंधकार, खिन्नता एवं अशांतिदायक होता है। सत्य उपदेश श्रवण पुण्य श्रेणी में आता है जबकि असत्य उपदेश श्रवण पाप श्रेणी में आता है। सत्य उपदेश प्रदान करना ईश्वरीय, महान, दिव्य, अद्भुत तथा अलौकिक कार्य है। किन्तु वर्तमान काल के उपदेशक संदेह के दायरे में आ रहे हैं, वे शब्द जालों से श्रोताओं के दिमाग को भ्रमित कर रहे। हमें उनकी ओर न देखकर ज्ञान के महान संग्रह शास्त्रों, पुराणों, गीता, रामायण एवं महाभारत आदि का अध्ययन करना चाहिए।
सत्य उपदेशों से एकांकी नहीं व्यापक दृष्टिकोण प्राप्त होता है। जब स्वार्थ सिद्धि के लिए किसी के मस्तिष्क को वशीभूत किया जाता है, तब उन विचारों का स्तर संकीर्ण तथा सीमित दायरे में होता है। हमारे समाज में तथाकथित उपदेशक अपने निजी स्वार्थों की पूर्ति हेतु भोले-भाले जनों को कुचाल, षडयंत्र तथा मायाजाल में फंसा रहें हैं। अधिकांश लोग स्वतंत्र विचारधारा से जुड़ नहीं पाते, ब्रेन वाशिंग द्वारा उनके दिमाग में जो भरा गया, जीवन भर वही बुदबुदाते रहते हैं। उपदेशक का धर्म होता- सत्य दर्शन कराना, विवेक जगाना और कर्तव्य बोध कराना। किन्तु आजकल अधिकांश उपदेशक मानसिक गुलाम बनाने की प्रतिस्पर्धा में भयंकर-भयंकर कहानियां गड़कर जनता को गुमराह कर रहे हैं और मनोरोगी बना रहे हैं। जिनके कारण अनेक लोग अंधकार और भटकाव की जिंदगी जी रहे हैं, वे तथाकथित उपदेशक शातिर, बदमाश होते हैं, सफेद चोला ओढ़कर गुरु होने का दंभ भरते हैं । समाज में तथाकथित उपदेश प्रदान करने वाले अगर सच्चे होते तो आज समाज की तस्वीर बदल गई होती, अपवित्रता विस्तार न ले रही होती, आहार-विहार सात्विक हो गया होता। आम आदमी से ज्यादा तनाव, परेशानी फर्जी गुरुओं के मनमुखी ज्ञान प्राप्त कर्ताओं को है। ऋषियों द्वारा ज्ञानोपदेश की परंपरा समाज में पवित्रता विद्यमान रहे, इसलिए की गई थी। टीवी चैनल, सोशल मीडिया, पत्र पत्रिका, बैनर, पोस्टर आदि सभी जगह उपदेश मौजूद हैं। फिर समाज क्यों अपवित्र कार्यों में निमग्न है, समीक्षा का विषय है।
ऋषि अष्टावक्र ने गीता में ज्ञानोपदेश की महिमा बताई-
वस्तुश्रवणमात्रेण शुद्धबुद्धिर्निराकुल:।
नैवाचारमनाचारमौदस्यं वा प्रपश्यति।।
अर्थात्- यथार्त वस्तु के श्रवण मात्र से ही शुद्ध बुद्धि वाला स्वयं में स्थिर (आत्मस्थ) हो जाता है, वह किसी आचार, अनाचार, शुभ या अशुभ के द्वंद में नहीं रहता है। ज्ञान हमें द्वंद से निकालता है, उचित-अनुचित में भेद करना सिखलाता है और उचित आचार-विचार करने की प्रेरणा देता है। यथार्थ श्रवण मात्र से व्यक्ति, समाज में परिवर्तन हो जाता है लेकिन श्रवण कराने वाला स्वयं में जो सुना रहा वैसा स्वयं में हो, तभी प्रभाव पड़ेगा।
ऐसा शास्त्र वचन है-
मनस्येकं वचस्येकं कर्मण्येकं महात्मनाम्।
मनस्यन्यद् वचस्यन्यत् कर्मण्यन्यद् दुरात्मनाम् ।।
अर्थात्- महात्माओं के मन, वचन और कर्म तीनों में एक ही बात होती है, परंतु दुरात्माओं के मन, वचन और कर्म तीनों में अलग अलग बातें होती हैं।
' न हि ज्ञानेन सदृशं पवित्रमिह विद्यते '
श्रीमद्भगवद्गीता के अनुसार इस लोक में ज्ञान के समान नि:संदेह पवित्र करने वाला दूसरा साधन नहीं है। प्रत्येक मनुष्य की आत्मा पवित्र है। देहभाव अपवित्रता की ओर ले जाता है। ज्ञान हमें आत्मबोध प्रदान करता है, पवित्रता से ओत-प्रोत करता है। पवित्रता ही दिव्य जीवन का धरातल है, जिसकी उपज मोक्ष है। पवित्रता ज्ञान से आती है, बाजार से खरीदी नहीं जाती है। धन बल से ब्रह्मज्ञान नहीं मिलता है। ब्रह्मतेज छल में नहीं, पवित्रता में विद्यमान है। पवित्रता स्थूल नहीं, सूक्ष्म विषय है। उदाहरण के तौर पर होटल के बर्तन, वस्त्र स्थूल तौर पर स्वच्छ होते हैं, पवित्र नहीं क्योंकि उनमें मादक पदार्थों एवं तामसिक पदार्थों का संक्रमण होता है। पवित्रता आत्मा के शुद्ध भावों से प्रभावित होती है, ब्रह्मज्ञान गंगा के पवित्र जल की तरह निरंतर शुद्ध अवस्था में प्रवाहित होता है। जब किसी का वैचारिक संस्थान सदा पवित्र, सकारात्मक, सृजनात्मक एवं कल्याणकारी चिंतन का उत्सर्जन करे, तब समझो उन्हें ब्राह्मी स्थिति प्राप्त महापुरुष। पवित्रता आत्मा का शाश्वत गुण है, सत्य उपदेश हमें मन, वचन, कर्म से पवित्र जीवनयापन की ओर उन्मुख करता है, विकारों से मुक्ति का उद्घोष करना सिखलाता है। ब्रह्मज्ञान प्राप्त आत्मा विषयों में अनुरक्त नहीं होगी, फिर उसका विषय विकारों से व्याप्त संसार में आवागमन क्यों होगा। इस संसार में जीवात्मा विषय वासना की असंतुष्ट इच्छा की पूर्ति हेतु ही आती है। ब्रह्मज्ञान मोक्ष प्रदाता है, इसलिए ब्रह्मज्ञान अतुल्य, अद्वितीय, अलौकिक एवं कल्याणकारी ज्ञान है।
राजदरबार में सभी नगरवासियों को श्रीराम का सत्य उपदेश-
सोइ सेवक प्रियतम मम सोई।
मम अनुसासन मानै जोई।।
जौं अनीति कछु भाषौ भाई।
तौ मोहि बरजहु भय बिसराई।।
अर्थात्- वही मेरा सेवक है और वही प्रियतम है, जो मेरी आज्ञा माने। हे भाई! यदि मैं कुछ अनीति की बात कहूं तो भय भुलाकर मुझे रोक देना।
बड़े भाग्य मानुष तन पावा।
सुर दुर्लभ सब ग्रंथन गावा।।
साधन धाम मोच्छ कर द्वारा।
पाइ न जेहिं परलोक संवारा।।
अर्थात्- बड़े भाग्य से ये मनुष्य शरीर मिला है। सब ग्रंथों ने यही कहा है की यह शरीर देवताओं को भी दुर्लभ है (कठिनता से मिलता है)। यह साधन का धाम और मोक्ष का दरवाजा है। इसे पाकर भी जिसने परलोक न बना लिया,।
सो परत्र दुख पावइ सिर धुनि धुनि पछिताइ।
कालहि कर्महि ईश्वरहि मिथ्या दोष लगाइ।।
अर्थात्- वह परलोक में दुख पाता है, सिर पीट पीटकर पछताता है तथा अपना दोष न समझकर काल, कर्म और ईश्वर पर मिथ्या दोष लगाता है।
एहि तन कर फल विषय न भाई।
स्वर्गउ स्वल्प अंत दुखदाई।।
नर तन पाइ विषय मन देहीं।
पलट सुधा ते सठ विष लेहीं।।
अर्थात्- हे भाई! इस शरीर के प्राप्त होने का फल विषय भोग नहीं है। इस जगत के भोगों की बात ही क्या, स्वर्ग का भोग भी बहुत थोड़ा है और अंत में दुख देने वाला है। अतः जो लोग मनुष्य शरीर पाकर विषय भोगों में मन लगा देते हैं, वे मूर्ख अमृत को बदलकर विष ले लेते हैं।
सत्य उपदेश जीवात्मा को मुक्ति की राह पर ले जाते हैं। जो मोक्ष से हटकर उपदेश दे रहे हैं, उनका ध्येय ब्रह्मज्ञान नहीं, भ्रमज्ञान है। इसलिए सावधान रहें और परिवार में सबको प्रेरणा दें, हर प्रकार की विकट स्थिति में हमें श्रीराम चरित्र का ही अवलंबन लेना चाहिए। सोशल मीडिया पर आ रहे उपदेशकों से सावधानी बरतनी चाहिए । श्रीराम के उपदेश रामायण तथा रामचरित मानस दोनों ग्रंथों में प्रचुरता से हैं।
रामायण में श्रीराम द्वारा प्रदत्त उपदेश-
नहि लोकविरुद्धस्य लोकव्रतादपेयुष:।
दण्डादन्यत्र पश्यामि निग्रहं हरियूथप।।
अर्थात्- वानरराज! जो लोकाचार से भ्रष्ट होकर लोकविरुद्ध आचरण करता है, उसे रोकने और राह पर लाने के लिए मैं दण्ड के सिवाय और कोई उपाय नहीं देखता।
✍️अमित निरंजन
लेखक- समग्र नैतिक क्रान्ति द्रष्टा राष्ट्रादर्श श्रीराम
उन्नायक - श्रीराम नवमी राष्ट्रीय चरित्र दिवस अभियान
samagranaitikkranti@gmail.com
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