देवासुर संग्राम सृष्टि का विधान
देवासुर संग्राम के इतिहास पर दृष्टिपात करने के पश्चात् यही निष्कर्ष निकला जब से सृष्टि अस्तित्व में आई तभी से देवासुर संग्राम का आगाज हुआ। सटीक, सरल, संक्षिप्त भाषा में कहा जाए तो अतिश्योक्ति न होगी- देवासुर संग्राम सृष्टि का विधान। वाल्मीकि रामायण में वर्णन है - असृजद् भगवान् पक्षौ द्वावेव हि पितामहः। सुराणामसुराणां च धर्माधर्मौ तदाश्रयौ।। अर्थात्- भगवान ब्रह्मा ने सुर और असुर दो ही पक्षों की सृष्टि की है, धर्म और अधर्म ही इनके आश्रय हैं। श्रीमदभगवद्गीता में वर्णन है- द्वौ भूतसर्गौ लोके ऽस्मिन्दैव आसुर एव च। अर्थात्- संसार में मनुष्य की दो प्रकार की सृष्टि है, जिसकी रचना की जाए वही सृष्टि है अर्थात् दैवी संपत्ति और आसुरी संपत्ति से युक्त रचे हुए प्राणी ही यहाँ भूत- सृष्टि के नाम से कहे जाते हैं। दैवीसंपदावान धर्माचरण करने वाले और आसुरीसंपदावान अधर्म का आचरण करने वाले होते हैं। दो विपरीत मानसिकता, विचारधारा, आदर्श, परंपरा, संस्कृति एवं पद्धति वाले एकमत नहीं हो सकते। यही इतिहास रहा अनादि सृष्टि का, जहां एकतंत्र के शासन में समूची धरती कभी नहीं रह...